मौन भी अभिव्यंजना है
" जाति ना पूछो साधू की , पूछ लीजिये ज्ञान
मोल करो तरवार का , पड़ा रहन दो म्यान। "
भारतीय समाज और संस्कृति की विशेषता रही है कि यहाँ सदैव नैतिक मूल्यों , आदर्शों और संस्कारों की पूजा होती रही है। ये मूल्य , आदर्श ,संस्कार कहीं न कहीं व्यक्ति के ज्ञान का कारण और ज्ञान का प्रतिफलन रहे हैं। शायद यही वजह रही कि हमारे पुराने कवियों ने जाति भेद का सदा विरोध किया और व्यक्ति को आत्मज्ञान के स्तर तक आलोकित करने का प्रयत्न वे आजीवन करते रहे। इन्ही महान कवियों और संतों के कारण हमारा देश रंग-बिरंगी फुलवारी की भाँति विभिन्नताओं से रंगा गया।
आज इन कवियों और संतों की प्रासंगिकता सुबह चाय की चुस्की के साथ अखबार की हैडलाइन पढ़ते ही हो जाती है। अखबार में मुख्य समाचार देश की कोई उपलब्धि नहीं बल्कि किसी नेता का जातिसूचक बयान होता है। ये बुद्धिहीन राजनेता एक मुख्यमंत्री की सादगी का मजाक बनाने में पीछे नहीं हटते तो कभी प्रधानमन्त्री जी के महंगे कपड़ों की आलोचना करने लगते हैं , गरीब पृष्टभूमि का होने के कारण ये प्रधानमन्त्री को दलित कह देते हैं तो कभी अपना देश छोड़कर भारत को ससुराल के रूप में स्वीकार कर चुकी महिला को विदेशी कह कर सम्बोधित करते हैं।
जिस देश की आबादी सवा सौ करोड़ हो , जिस देश में दुनिया के सबसे ज्यादा युवा निवास करते हों , जो देश सभ्यता और संस्कृति का पर्याय रहा है , जो देश दुनिया का सबसे प्राचीन शैक्षिक केंद्र रहा है , जो विश्वगुरु रहा है उस देश की जनता अगर सुबह सुबह शिक्षा , चिकित्सा , परिवहन , गरीबी आदि विषयों की बजाय जाती के जाल में फंस जाती है तो आगे का दिन फिर हिन्दू - मुस्लिम , मंदिर - मस्जिद , राम -अल्लाह आदि की चर्चा में ही बीत जाना है। ऐसे दौर में हमारा देश किस उम्मीद पर स्वर्णिम भविष्य की आशा किये हुए है ?
' दुष्यंत कुमार ' का एक शेर है
" कैसे कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं "
दुष्यंत जी जब ये लिखते हैं तो कहीं न कहीं वे भारतीय राजनीति भविष्य का पूर्वानुमान करते हैं। वर्तमान में देश के जो राजनितिक हालात बन रहे हैं उनमें ये कहना ठीक भी है की इस तालाब का पानी तो पूरा गंदला हो चूका है।
जो राजनीति पंडित नेहरू जी की विरासत थी , जिसमें राष्ट्रकवि दिनकर के औदात्य का प्रभाव था , जिसमें लालबहादुर शास्त्री जी भरे मूल्य थे , जिसमें इंदिरा जी का लौहपुर्ण व्यक्तित्व था , जो राजनीति अटल बिहारी वाजपेयी जैसे सर्वसम्मानित और सर्वप्रिय नेता की अमानत थी उस राजनीति का अटल जी के बाद इतने कम समय में ही ऐसा कुत्सित रूप हो जायेगा ऐसी कल्पना तो इन महान नेताओं ने कभी स्वप्न में भी नहीं की होगी।
कहीं देश के प्रधानमंत्री के पूर्व में किये रोजगार का मजाक बनाया जाता है तो कहीं एक बड़े नेता की जाति को और धर्म को हिन्दू मुस्लिम की चक्की में पिसा जाता है। दुर्भाग्य की बात ये है की ये सब वाकया जनता के सामने मंच से बोला जाता है। इसके बावजूद सभी दल एक दूसरे पर व्यक्तिगत घृणित टिप्पणियाँ करके स्वयं को श्रेष्ठ बताने का गुनाह भी कर रहे हैं।
शर्म को बेच चुके ये राजनेता जब ऐसे बयान देते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि ये 5000 साल पुराने इस देश का इतिहास भूल गए हैं , या फिर ऐसा लगता है कि ये किसी दुसरे ग्रह से आये हुए जीव हैं जिन्हे यहाँ की परम्पराओं के बारे में नहीं पता। जिस देश में ज्ञान को सबसे बड़ा माना जाता था उस देश में आज जाति धर्म को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आज तलवार की म्यान को महत्त्व दिया जा रहा है जो कि आने वालो पीढ़ियों के लिए खतरनाक हो सकता है।
बार - बार देश की गरिमा को तार तार करने वाले इन नेताओं को हिंदी के बड़े विद्वान् और कवि ' अज्ञेय ' जी पंक्तियाँ बड़ी सीख दे सकती हैं।
अज्ञेय जी लिखते हैं -
" जितना तुम्हारा सच है उतना ही कहो
मोल करो तरवार का , पड़ा रहन दो म्यान। "
भारतीय समाज और संस्कृति की विशेषता रही है कि यहाँ सदैव नैतिक मूल्यों , आदर्शों और संस्कारों की पूजा होती रही है। ये मूल्य , आदर्श ,संस्कार कहीं न कहीं व्यक्ति के ज्ञान का कारण और ज्ञान का प्रतिफलन रहे हैं। शायद यही वजह रही कि हमारे पुराने कवियों ने जाति भेद का सदा विरोध किया और व्यक्ति को आत्मज्ञान के स्तर तक आलोकित करने का प्रयत्न वे आजीवन करते रहे। इन्ही महान कवियों और संतों के कारण हमारा देश रंग-बिरंगी फुलवारी की भाँति विभिन्नताओं से रंगा गया।
आज इन कवियों और संतों की प्रासंगिकता सुबह चाय की चुस्की के साथ अखबार की हैडलाइन पढ़ते ही हो जाती है। अखबार में मुख्य समाचार देश की कोई उपलब्धि नहीं बल्कि किसी नेता का जातिसूचक बयान होता है। ये बुद्धिहीन राजनेता एक मुख्यमंत्री की सादगी का मजाक बनाने में पीछे नहीं हटते तो कभी प्रधानमन्त्री जी के महंगे कपड़ों की आलोचना करने लगते हैं , गरीब पृष्टभूमि का होने के कारण ये प्रधानमन्त्री को दलित कह देते हैं तो कभी अपना देश छोड़कर भारत को ससुराल के रूप में स्वीकार कर चुकी महिला को विदेशी कह कर सम्बोधित करते हैं।
जिस देश की आबादी सवा सौ करोड़ हो , जिस देश में दुनिया के सबसे ज्यादा युवा निवास करते हों , जो देश सभ्यता और संस्कृति का पर्याय रहा है , जो देश दुनिया का सबसे प्राचीन शैक्षिक केंद्र रहा है , जो विश्वगुरु रहा है उस देश की जनता अगर सुबह सुबह शिक्षा , चिकित्सा , परिवहन , गरीबी आदि विषयों की बजाय जाती के जाल में फंस जाती है तो आगे का दिन फिर हिन्दू - मुस्लिम , मंदिर - मस्जिद , राम -अल्लाह आदि की चर्चा में ही बीत जाना है। ऐसे दौर में हमारा देश किस उम्मीद पर स्वर्णिम भविष्य की आशा किये हुए है ?
' दुष्यंत कुमार ' का एक शेर है
" कैसे कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं "
दुष्यंत जी जब ये लिखते हैं तो कहीं न कहीं वे भारतीय राजनीति भविष्य का पूर्वानुमान करते हैं। वर्तमान में देश के जो राजनितिक हालात बन रहे हैं उनमें ये कहना ठीक भी है की इस तालाब का पानी तो पूरा गंदला हो चूका है।
जो राजनीति पंडित नेहरू जी की विरासत थी , जिसमें राष्ट्रकवि दिनकर के औदात्य का प्रभाव था , जिसमें लालबहादुर शास्त्री जी भरे मूल्य थे , जिसमें इंदिरा जी का लौहपुर्ण व्यक्तित्व था , जो राजनीति अटल बिहारी वाजपेयी जैसे सर्वसम्मानित और सर्वप्रिय नेता की अमानत थी उस राजनीति का अटल जी के बाद इतने कम समय में ही ऐसा कुत्सित रूप हो जायेगा ऐसी कल्पना तो इन महान नेताओं ने कभी स्वप्न में भी नहीं की होगी।
कहीं देश के प्रधानमंत्री के पूर्व में किये रोजगार का मजाक बनाया जाता है तो कहीं एक बड़े नेता की जाति को और धर्म को हिन्दू मुस्लिम की चक्की में पिसा जाता है। दुर्भाग्य की बात ये है की ये सब वाकया जनता के सामने मंच से बोला जाता है। इसके बावजूद सभी दल एक दूसरे पर व्यक्तिगत घृणित टिप्पणियाँ करके स्वयं को श्रेष्ठ बताने का गुनाह भी कर रहे हैं।
शर्म को बेच चुके ये राजनेता जब ऐसे बयान देते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि ये 5000 साल पुराने इस देश का इतिहास भूल गए हैं , या फिर ऐसा लगता है कि ये किसी दुसरे ग्रह से आये हुए जीव हैं जिन्हे यहाँ की परम्पराओं के बारे में नहीं पता। जिस देश में ज्ञान को सबसे बड़ा माना जाता था उस देश में आज जाति धर्म को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आज तलवार की म्यान को महत्त्व दिया जा रहा है जो कि आने वालो पीढ़ियों के लिए खतरनाक हो सकता है।
बार - बार देश की गरिमा को तार तार करने वाले इन नेताओं को हिंदी के बड़े विद्वान् और कवि ' अज्ञेय ' जी पंक्तियाँ बड़ी सीख दे सकती हैं।
अज्ञेय जी लिखते हैं -
" जितना तुम्हारा सच है उतना ही कहो
मौन भी अभिव्यंजना है "
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