लेम्बोर्गिनी में आये साइकिल ठीक करने
बड़े दिनों से जो साइकिल पंक्चर थी उसे सुधारने के लिए एक लेम्बोर्गिनी सुधारने आया है । यह पञ्चरवाला कोई और नही बल्कि यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का बड़ा भाई है , जो कल अपनी बड़ी सी गाड़ी में छोटी सी साइकिल सुधारने आया है। यूपी की राजनीती राजनीती की साइकिल यूँ ही खराब नही हुई इसके पीछे एक लंबी कहानी है । दरअसल बाप बेटे दोनों साइकिल पर सवार होकर राजनीती की पटरी पर दौड़े जा रहे थे कि बीच में चचाजान आ फँसे । अब दो सवारी की साइकिल पर तीन लोग सवार होने की कोशिश करेंगे तो एक न एक तो नीचे गिरेगा ही । अब नीचे चाचा भतीजा में से एक को ही गिरना होगा , क्योंकि मुलायम सिंह जी तो परिवार के बुजुर्ग आदमी । इस उम्र में जहां वो pm की कुर्सी की आश लगाए बैठे थे , वही अब साइकिल सम्भलना मुश्किल हो गया ।
इस साइकिल की लड़ाई में मुलायम सिंह जी धर्म संकट में पड़ गए । एक तरफ जहां माँ जाया भाई है तो दूसरी तरफ खुद की औलाद है । इस संकट के समय में मुलायम सिंह जी ने भाईचारा दिखाते हुए कभी अखिलेश यादव को बुरा कहा तो कभी अपनी औलाद का पक्ष लेते हुए पितृधर्म निभाया । लेकिन कहते है न की एक साथ दो नावों पर नही चल सकते , इसी तरह शिवपाल और अखिलेश जी एक साथ नही आ पाए । शरारती भाई और बिगड़ी औलाद जिनके यहाँ हो वो कैसे सुखी रह सकता है और मुलायम जी के यहाँ तो दोनों ही पैदा हो गए । इनका दर्द तो ये खुद ही जान सकते हैं । घर की इस लड़ाई में चाचा भतीजा एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नही छोड़ रहे हैं । यूपी की इस पंक्चर साइकिल को सुधारने के लिए अमरसिंह जैसे अनुभवी लोगों तक ने कोशिश की , लेकिन सुना है ना कि वक्त हो बुरा तो हर काम अधूरा । एक दो बार दोनों चाचा भतीजा ने लोगों के सामने आकर आपसी समझदारी का परिचय देना चाहा तो अखिलेश जी चचा के मन की बात समझ गए और उन्होंने वही बात लोगों को बतानी चाही , इसलिए उन्होंने चचाजान से माइक छीनने की कोशिश की थी। मीडिया ने इसे मुद्दा बना दिया । अब सोचो जरा जब एक दूसरे की मन की बात वो समझ रहे हैं तो फिर लड़ाई कहाँ । और ईसी दौरान दोनों को कुछ ज्यादा ही बाते समझ आ गयी थी जिससे दोनों को पता चला की दोनों के मन में यूपी की बड़ी कुर्सी के ख्वाब है । बस फिर क्या था , लग गए दोनों
ख्वाब हकीकत बनाने में। इस ख्वाब -ख्वाब के खेल में मुलायम सिंह जी के जाने कितने ख्वाब टूटे सितारे हो गए ।
ख्वाबो ख़्वाबों के इस खेल में कइयो के ख्वाब पानी हो गए । इस बीच ये तो साफ़ हो गया की मार्गदर्शक मंडल केवल बीजेपी में ही नही बल्कि कई पार्टीयो में है । घर की बातें बाहर आने का असर चुनावों में होगा या नहीं ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा पर चाचा - भतीजा की इस लड़ाई में बेचारा मुलायम सिंह जैसा बुजुर्ग कहां जाएगा ।अब देखने वाली बात ये है कि जिनसे अपना घर नहीं सम्भाला जा रहा वो पूरा राज्य कैसे सम्भालेंगे । ऐसे समय में तो मुलायम जी के लिये यही ख्याल दिल में आता है -
" भाई-बेटे के चक्कर में बदनाम हो गया वरना आदमी मुलायम भी काम का था । "
खैर देखते हैं की ये लेम्बोर्गिनी वाला इस साइकिल को सुधार पायेगा या नहीं , पर इन दिनों साइकिल का जो हश्र हुआ है वो देख कर तो मुलायम सिंह जी यही कह सकते हैं -
" अगले जनम मोहे साइकिल ना दीजो।"
इस साइकिल की लड़ाई में मुलायम सिंह जी धर्म संकट में पड़ गए । एक तरफ जहां माँ जाया भाई है तो दूसरी तरफ खुद की औलाद है । इस संकट के समय में मुलायम सिंह जी ने भाईचारा दिखाते हुए कभी अखिलेश यादव को बुरा कहा तो कभी अपनी औलाद का पक्ष लेते हुए पितृधर्म निभाया । लेकिन कहते है न की एक साथ दो नावों पर नही चल सकते , इसी तरह शिवपाल और अखिलेश जी एक साथ नही आ पाए । शरारती भाई और बिगड़ी औलाद जिनके यहाँ हो वो कैसे सुखी रह सकता है और मुलायम जी के यहाँ तो दोनों ही पैदा हो गए । इनका दर्द तो ये खुद ही जान सकते हैं । घर की इस लड़ाई में चाचा भतीजा एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नही छोड़ रहे हैं । यूपी की इस पंक्चर साइकिल को सुधारने के लिए अमरसिंह जैसे अनुभवी लोगों तक ने कोशिश की , लेकिन सुना है ना कि वक्त हो बुरा तो हर काम अधूरा । एक दो बार दोनों चाचा भतीजा ने लोगों के सामने आकर आपसी समझदारी का परिचय देना चाहा तो अखिलेश जी चचा के मन की बात समझ गए और उन्होंने वही बात लोगों को बतानी चाही , इसलिए उन्होंने चचाजान से माइक छीनने की कोशिश की थी। मीडिया ने इसे मुद्दा बना दिया । अब सोचो जरा जब एक दूसरे की मन की बात वो समझ रहे हैं तो फिर लड़ाई कहाँ । और ईसी दौरान दोनों को कुछ ज्यादा ही बाते समझ आ गयी थी जिससे दोनों को पता चला की दोनों के मन में यूपी की बड़ी कुर्सी के ख्वाब है । बस फिर क्या था , लग गए दोनों
ख्वाब हकीकत बनाने में। इस ख्वाब -ख्वाब के खेल में मुलायम सिंह जी के जाने कितने ख्वाब टूटे सितारे हो गए ।
ख्वाबो ख़्वाबों के इस खेल में कइयो के ख्वाब पानी हो गए । इस बीच ये तो साफ़ हो गया की मार्गदर्शक मंडल केवल बीजेपी में ही नही बल्कि कई पार्टीयो में है । घर की बातें बाहर आने का असर चुनावों में होगा या नहीं ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा पर चाचा - भतीजा की इस लड़ाई में बेचारा मुलायम सिंह जैसा बुजुर्ग कहां जाएगा ।अब देखने वाली बात ये है कि जिनसे अपना घर नहीं सम्भाला जा रहा वो पूरा राज्य कैसे सम्भालेंगे । ऐसे समय में तो मुलायम जी के लिये यही ख्याल दिल में आता है -
" भाई-बेटे के चक्कर में बदनाम हो गया वरना आदमी मुलायम भी काम का था । "
खैर देखते हैं की ये लेम्बोर्गिनी वाला इस साइकिल को सुधार पायेगा या नहीं , पर इन दिनों साइकिल का जो हश्र हुआ है वो देख कर तो मुलायम सिंह जी यही कह सकते हैं -
" अगले जनम मोहे साइकिल ना दीजो।"




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