जब धरती पर इंसान रहता था
आज मैं कुछ ऐसे वाकयों का ज़िक्र कर रहा हूँ जिन्होंने तकनीक के प्रति मेरा नजरिया कुछ हद तक बदल दिया है।
1 - 11 वीं कक्षा के एक विद्यार्थी ने कहा -" भैया मेरे instagram पर 700 follow request पड़ी हैं ऍप्रूवल के लिए। "
अगर हम बात करें सोशल मीडिया की तो जिस फेसबुक की शुरुआत एक बदले और धोखे की भावना के साथ हुई वह फेसबुक हमें समाज से कैसे जोड़ सकती है। फेसबुक और इंस्टाग्राम के लाइक्स के पीछे हम लोग इतने पागल हो चुके हैं कि हम भूलते जा रहे हैं कि इस आभासी दुनिया के अलावा एक वास्तविक दुनिया भी है। सोशल साइट्स ने ही समाज में सोशल एक्टिविटीज को कम कर दिया है। आज अगर स्कूल के बच्चों की बात करें तो बातचीत से भी जिज्ञासा और खेलकूद ख़त्म हो रहे हैं , 10 साल का बच्चा भी आज अपने लिए टॉप फीचर्ड फ़ोन चाहता है और माता पिता उसकी ये ख्वाहिश पूरी भी करते हैं। मुद्दा की बात ये है कि कहीं इस तकनीक के दौर में इन बच्चों का बचपना तो ख़त्म नहीं हो रहा। आज के समय में हमारी विडंबना है कि ख़ुशी रूप और खुश होने के मायने बदल रहे हैं , जो तकनीक शारीरिक सुख के लिए बनी थी वह हमें आत्मिक शांति कैसे दे सकती है।
कॉलेज के जिन स्टूडेंट्स को नए नए विचार साझा करने चाहिए वो इस बात से खुश हो रहे हैं कि उन्हें कोई ऐसी एप्लीकेशन मिल गयी है जो उनकी फोटो १०० लाइक बढ़ा सकती है। देश में कोनसी नई सरकारी योजनाएं लागू हुई हैं या सरकार की किन नीतियों से देश को फायदा होने वाला है , किनसे नहीं ? ये जानने की बजाय उनके मोबाइल्स में रोजाना नए कैमरा ऍप्लिकेशन्स डाउनलोड हो रहे हैं जिनसे उनकी तस्वीर अधिक साफ़ और सुन्दर आये। कोई दोस्तों का समूह कहीं घूमने जाता है तो उन्हें उस जगह की खूबसरती देखने से ज्यादा उस जगह पर खुद की तस्वीर खींचने का शौक चढ़ा रहता है। अनेक बार ऐसा हुआ है कि खतरनाक जगहों पर फोटो खींचने के चक्कर में व्यक्ति को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा है। क्या कोई भी फोटो हमारी जिंदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण और जिंदगी से ज्यादा खूबसूरत है ?

1 - 11 वीं कक्षा के एक विद्यार्थी ने कहा -" भैया मेरे instagram पर 700 follow request पड़ी हैं ऍप्रूवल के लिए। "
2 - ग्रेजुएशन में सहपाठी ने खुश होते हुए कहा -"भाई मेरी फोटो पर 1500 लाइक्स हैं। "
3 - एक बड़े पद पर कार्यरत एक सज्जन ने कहा -"तू मेरी पोस्ट लाइक नहीं करता यार ( जब मेरे द्वारा पोस्ट लाइक करने का सकारात्मक जवाब दिया गया तो बोले कि अच्छा कमेंट नहीं करता होगा ) "
4 - मजाकिया तौर पर मैंने एक जूनियर का मोबाइल रखना चाहा तो उसने कहा -" भैया , मेरा फोन मेरी जान है। "
इन घटनाओं का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि तकनीक के इस दौर में हम किस मुकाम पर आ गए हैं। जो तकनीक हमारी सहूलियत के लिए बनी थी , उसने हमें इस कदर जकड़ लिया है कि आज हम तकनीक को नहीं बल्कि तकनीक हमें चला रही है। जिस मोबाइल का आविष्कार अपनों से जुड़ाव के लिए हुआ , वही मोबाइल आज हमें अपनों से दूर कर रहा है। आज हालात ऐसे हैं कि घर में सदस्य कम है और मोबाइल्स ज्यादा हैं।
अगर हम बात करें सोशल मीडिया की तो जिस फेसबुक की शुरुआत एक बदले और धोखे की भावना के साथ हुई वह फेसबुक हमें समाज से कैसे जोड़ सकती है। फेसबुक और इंस्टाग्राम के लाइक्स के पीछे हम लोग इतने पागल हो चुके हैं कि हम भूलते जा रहे हैं कि इस आभासी दुनिया के अलावा एक वास्तविक दुनिया भी है। सोशल साइट्स ने ही समाज में सोशल एक्टिविटीज को कम कर दिया है। आज अगर स्कूल के बच्चों की बात करें तो बातचीत से भी जिज्ञासा और खेलकूद ख़त्म हो रहे हैं , 10 साल का बच्चा भी आज अपने लिए टॉप फीचर्ड फ़ोन चाहता है और माता पिता उसकी ये ख्वाहिश पूरी भी करते हैं। मुद्दा की बात ये है कि कहीं इस तकनीक के दौर में इन बच्चों का बचपना तो ख़त्म नहीं हो रहा। आज के समय में हमारी विडंबना है कि ख़ुशी रूप और खुश होने के मायने बदल रहे हैं , जो तकनीक शारीरिक सुख के लिए बनी थी वह हमें आत्मिक शांति कैसे दे सकती है।
आज सोशल मीडिया पर तरह तरह के झूठ फैलाये जाए रहे हैं जिनका यथार्थ से कोई सम्बन्ध नहीं होता , लेकिन इन झूठ से समाज में अशांति जरूर फ़ैल जाती है और सरकारी स्तर पर तथा निजी सत्तर पर इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। ऐसे कई उदाहरण हमें पिछलेकुछ दिनों में देखने को मिले हैं।
कॉलेज के जिन स्टूडेंट्स को नए नए विचार साझा करने चाहिए वो इस बात से खुश हो रहे हैं कि उन्हें कोई ऐसी एप्लीकेशन मिल गयी है जो उनकी फोटो १०० लाइक बढ़ा सकती है। देश में कोनसी नई सरकारी योजनाएं लागू हुई हैं या सरकार की किन नीतियों से देश को फायदा होने वाला है , किनसे नहीं ? ये जानने की बजाय उनके मोबाइल्स में रोजाना नए कैमरा ऍप्लिकेशन्स डाउनलोड हो रहे हैं जिनसे उनकी तस्वीर अधिक साफ़ और सुन्दर आये। कोई दोस्तों का समूह कहीं घूमने जाता है तो उन्हें उस जगह की खूबसरती देखने से ज्यादा उस जगह पर खुद की तस्वीर खींचने का शौक चढ़ा रहता है। अनेक बार ऐसा हुआ है कि खतरनाक जगहों पर फोटो खींचने के चक्कर में व्यक्ति को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा है। क्या कोई भी फोटो हमारी जिंदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण और जिंदगी से ज्यादा खूबसूरत है ?
न केवल विद्यार्थी बल्कि बड़े और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को भी इसी तकनीक का शिकार होते देखा गया है। जब कोई जिम्मेदार व्यक्ति आपको फ़ोन पर बोले कि आप उनकी पोस्ट लाइक नहीं करते तो आप समझ सकते हैंकि यह तकनीक किस कदर उन पर हावी हो चुकी है। माना की सोशल मीडिया पर व्यक्ति की लोकप्रियता का पता चलता है , लेकिन यह कोई सार्वभौमिक सत्य नहीं है कि जो सोशल मीडिया पर लोकप्रिय है वह वास्तविकता में भी उतना ही लोकप्रिय हो। हमें हमारे आसपास आज भी ऐसे व्यक्ति मिल जायेंगे जो इंटरनेट की दुनिया से कोसों दूर हैं पर वो अपने समाज और अपने समूह में अत्यंत लोकप्रिय हैं।
इसी प्रकार जब कोई कहता है कि मोबाइल उसकी जान है तो यह तकनीक के गुलाम हने का प्रतीक है। क्या हमारी जान इतनी छोटी है की वह 5 इंच के मोबाइल में समा जाये ? क्या हमारी जान इतनी सस्ती है की वह एक मामूली सी फोटो के चक्कर में गँवा दी जाए ?क्या हमारे विचार फेसबुक और इंस्टाग्राम के लाइक्स में दब चुके हैं ? क्या हमारी यथार्थ चेतना फोटो क्लीयरिंग वाले ऍप्लिकेशन्स के कारण ख़त्म हो चुकी है ? क्या हमारा समय इतना मूल्यहीन है की हम उसे सोशल मीडिया पर झूठी ख़बरें फैलाने में ज़ाया करें ?
जिस तकनीक का ईजाद मनुष्य द्वारा किया गया वही तकनीक आज मनुष्य को काफी हद तक अपना गुलाम बना चुकी है। इंसानों के मशीनों के साथ जीने की कल्पना को हॉलीवुड फिल्मों में बड़े परदे पर दिखाया जाता है। इन फिल्मों में भी हम देख सकते हैं कि शुरुआत में तो इंसान मशीनों के साथ आराम से रहता है लेकिन बाद में यही मशीनें उसे चुभने लगती है , इंसान इन मशीनों से नफरत करने लगता है और अधिकतर फिल्मों में वह इन मशीनों के बन जाने का खामियाजा ही भुगतता ही नजर आता है।
भले ही ये फिल्में कल्पना पर आधारित हैं लेकिन अगर इसी तरह तकनीक इंसानों पर हावी होती रही तो यही हॉलीवुड फ़िल्में एक दिन सच भी हो जाएँगी , तब इन खोजों और तकनीकों को हम नहीं इस्तेमाल करेंगे बल्कि ये खोज और तकनीक इंसान को इस्तेमाल करेंगी। जिन तकनीक और विलासिताओं का मनुष्य आदिहो चूका है यदि समय रहते उनसे दूरियां नहीं बनाई गयी तो आने वाली जात्ति में किस्सा सुनाया जायेगा -


Bhut khub.....
ReplyDeleteLog mobile ke bhut aadi ho chuke h ...
Aaj log real life ki jgh virtual life jyada jee rhe h....
aapki pratikriya ke liye shukiya
Deleteyouth should be aware about it and should realize bad effect of social media and use it in progressive way
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