गरिमामयी सदन की करुणामयी कहानी

मैं इस देश का सबसे गरिमामय स्थान हूँ , यहाँ का संसद भवन । मुझमें यहाँ की तमाम जनता द्वारा चुना हुआ सेवकगण विराजित होता है ।मेरे लोकसभा और राज्यसभा दो बड़े रूप हैं । प्रत्येक राज्य में विधानसभा के रूप में भी मैं स्थापित हूँ। यूँ तो मेरा स्थान बड़ा गौरवशाली है और मेरी महत्ता इस देश में अत्यावश्यक भी है।लेकिन,पिछले कुछ समय में मेरे ही परिवार के सदस्यों ने ऐसे ऐसे कृत्य किये हैं कि आज मैं खुद की नजरों में भी शर्मसार हूँ।
इस देश के समस्त नियम और कानून मेरी छत के तले ही बनते हैं । इस देश की आजादी के बाद से 21वीं सदी में दुनिया में छाने का सफर मेरी देखरेख में हुआ है। लेकिन आज मेरे अपने घर के लोग छोटी छोटी बातों पर इतने लड़ने लगे हैं कि मेरा मन उन्हें यों झगड़ते देख क्षुब्ध होता जा रहा है। जिस जनता का शासन करने के लिए जनता ने अपने सेवक चुन कर इस परिसर में भेजे, वो आज जनसेवा के नाम पर इसी जनता को गुमराह कर रहे हैं । आज मेरे ही घरवालों ने अपनी कथनी और करनी से मुझे पीड़ित किया है।
मेरे ही देश में एक राज्य में मेरे विधानसभा जैसे पवित्र रूप को भूतहा कहा गया।जब अपने ही बेटे ऐसा कहें तो भला कौन दुःखी नहीं होगा ? जिस देश में व्यक्ति भूमि को अपनी माँ से भी बढ़कर मानता है , जिस स्थान पर अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए मेरे प्रताप जैसे बेटे ने घास की रोटी खाई हो , जहाँ भामाशाह जैसे दानवीर ने मेरी रक्षा के लिए अपनी संपत्ति तक दान दे दी उसी ज़मीन का कोई बेटा कहे कि इस विधानसभा में भूत बसते हैं तो मुझ पर क्या बीतेगी ? इस पर भी उनका मन न भरा और उन्होंने तांत्रिकों से मेरी जांच करवाई । क्या ये किसी भी दृष्टिकोण से उचित है ?
एक दूसरे राज्य में तो मेरे साथ जो हुआ वो जान कर आपकी भी आँखें भर आयेंगी। मेरी बनावट कुछ ऐसी है कि मेरे सभी सदस्य अपनी आवाज मुझ सदन के मुखिया ( सभापति ) तक पहुंचा सकें इस हेतू प्रत्येक सदस्य के आगे माइक लगा होता है।यह माइक ही इस देश की आम आवाज को मेरे परिसर में अनहद नाद की तरह गुंजित करता रहता है । मगर अफ़सोस कि मेरे ही परिवार के सदस्यों में ऐसी लड़ाई हुई कि इसी माइक से एक नेता ने दूसरे पर हमला किया जिससे उसे बड़ी शारीरिक क्षति पहुँच सकती थी । मेरा सिर शर्म से झुक गया जब उन लोगों ने यह कृत्य किया।आप कल्पना भी नहीं कर सकते जब एक घर में उसी घर के सदस्य आपस में लड़ें और गाली गलौच करें तो घर की क्या हालत होती है ?
मेरे लोकसभा और राज्यसभा रूपों में आये दिन हंगामें के नाम पर कामकाज स्थगित हो जाता है। यह ठीक उसी तरह है जैसे घर में सारे घरवाले मौजूद हैं मगर सब में इतनी अनबन हो चुकी है कि अब घर में चूल्हा नहीं जल रहा है।मेरे घर का चूल्हा भी कभी कभी जल पाता है।कई बार तो जलता चूल्हा बुझाने जैसी बात हो जाती है जब मेरे भवन में विराजित सदस्य आपस में बच्चों की तरह लड़ने लगते हैं। तब मजबूरी में मेरे मुखिया को कड़े फैसले लेने पड़ते हैं ( कार्यवाही स्थगन जैसे फैसले )।
जब कोई मकान बनता है तो उसमें मकान में ईंट पत्थर चुने सीमेंट के साथ साथ मकान में रहनेवालों की मेहनत की कमाई और खून पसीने के मिश्रण होता है जिससे वह मकान, घर बनता है।मुझ संसद भवन में भी ईंट पत्थरों के साथ इस देश की जनता की उम्मीदें , उनकी मेहनत की रोटी और उनका विश्वास मिला हुआ है जो मुझे अपनी गरिमामयी स्थिति का अहसास करवाता है ।
लेकिन इन दिनों ऐसे ऐसे लोग चयनित होकर मुझमें आने लगे जो इस स्थान के कतई लायक नहीं।जिनको बहस तो दूर , ढंग से बोलने का भी सलीका नहीं है। ये लोग मेरे स्वयं की तथा जनता की नजरों के सामने मेरा कद घटाने में कोई कसर नहीं रख रहे । इनका पूरा ध्यान केवल इनके अपने निजी स्वार्थ और इनके मातहतों का फायदा है इनका देश की आम जनता से कोई सरोकार नहीं है ।
हालांकि शुरू से ऐसा नहीं था।मेरे इस परिसर में अत्यंत गरिमामयी , सच्चे जनसेवक और देश की खातिर गंभीर लोग भी कभी यहाँ विराजमान हुए हैं । जिन्होंने विश्वपटल पर देश का नाम रोशन किया , खुद को दुनिया का ठेकेदार समझने वालों को जिन्होंने अपने बुद्धि और कौशल के बल पर जवाब दिया , आयरन लेडी , मिसाइल मैन जैसी महान विभूतियाँ यहाँ कभी विराजित हुई हैं जिनको आज भी पुरा विश्व याद करता है।परंतु , अब तो ये सब बीती बातें हो गए , मेरे अतीत की केवल मीठी सुनहरी याद के रूप में रह गए हैं , इनका ज़िक्र तो अब स्वर्णिम इतिहास का शुभ्र गान मात्र होगा।
वर्तमान में मेरी गिरती गरिमा और गौरव को बचाने का सामर्थ्य केवल आम जनता में है। यदि देश की जनता अच्छे एवं सच्चे देशसेवकों को चुनना शुरू कर दे तथा इन सदस्यों की योग्यता एवं विशिष्टता को ध्यान में रखकर चुनाव करे तो निश्चित ही में अपना गौरवशाली स्थान पुनः प्राप्त कर सकूँगा । वैसे भी जनता सिंहासन तक पहुँचाने से लेकर सिंहासन खाली कराने तक का सामर्थ्य रखती है। 'राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर' तो लिखते भी हैं
           " सदियों से ठंडी बुझी राख सुगबुगा उठी
             मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है
             हो रहा समय के घर्घर नाद सुनो
             सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ........।"

Comments

  1. rajniti ka girta str chintajanak hai

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  2. ये राजनेता देश को खोखला कर रहे हैं

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  3. ये राजनेता देश को खोखला कर रहे हैं
    इनकी राजनितिक हालात निरंतर बद से बदतर हो रहे हैं

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