कहाँ तक उचित है ?

कहाँ तक उचित है ? 

 जी हाँ ! यही सवाल है आज ज़ेहन में कि सत्तालोलुपता में गिर जाना और अहंकार में चूर हो जाना कहाँ तक उचित है ?
अपने तुच्छ से राजनीतिक स्वार्थ के लिए पूर्वजों को जिम्मेदार ठहराना कहाँ तक उचित है ?
अपने कार्यकाल में हुए घोटालों से सत्ता गंवाकर विपक्ष में बैठे लोगों का बेशर्म होकर सरकार पर झूठे आरोप लगाना कहाँ तक उचित है ?
जनता से बड़े बड़े वादे करना और उन्हें पूरा न करना कहाँ तक उचित है ?
सवाल पूछने का अधिकार समाप्त करने की कोशिशें कहाँ तक उचित हैं ?
अपनी गलतियों को छुपाने के लिए वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाना कहाँ तक उचित है ?
देश के वरिष्ठतम नेताओं और सम्मानित नागरिकों के लिए अमर्यादित टिप्पणियाँ करना कहाँ तक उचित है ?

जी हैं ! यही कुछ विषय है जिन पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए। 
व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु अहंकार है। जो तख़्त क्षणभंगुर हैं उनके मोद में सम्मुख खड़े व्यक्ति का अपमान करना कटाई न्यायोचित नहीं है। वर्तमान समय में सत्ताधारी संगठन ( भारतीय जनता पार्टी ) का कुछ कुछ ऐसा ही हाल है। जिस अहंकार ने रावण जैसे त्रिलोकज्ञानी को नष्ट कर दिया तो वर्तमान नेताओं की तो बिसात ही क्या है। विगत पांच वर्षों में ऐसा ही कुछ दृष्टिगोचर हुआ है। ऐसा ही कुछ हाल पिछली सरकार ( UPA  सरकार  ) का हुआ था परिणामस्वरूप उन्हें जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ा और सत्ता गंवानी पड़ी।  लेकिन , जब आपका विकल्प ही पुनः वही समस्या बन जाए तो कोई क्या करे ? और इस बार तो समस्या और विकराल रूप में सामने आयी है। 

1 . आजादी के बाद भारत ने अपनी सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक स्थितयों में अप्रत्याशित रूप से सुधार किया और हमारे साथ ही आजाद हुए पडोसी से हम कई गुना आगे निकल आये। देश के आजाद होने से लेकर आजतक देश में अनेक विकास कार्य हुए।  आज हमने शिक्षा , चिकित्सा , विज्ञान , तकनीक , कला , वाणिज्य और अन्य सभी क्षेत्रों में अच्छी प्रकार से वृद्धि की , लेकिन सभी कार्य एक ही सरकार में पूरे नहीं हो पाये तो आने वाली सरकारों ने अपने स्तर पर प्रयास किये और देश को विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया। सबसे अचरज की बात वर्तमान सरकार में ही देखने को मिली जिसने अपनी हर नाकामी को देश की पहली सरकार , पं. जवाहरलाल नेहरू की सरकार पर थोप दिया। जरुरी नहीं की व्यक्ति के सारे फैसले सही हों , लेकिन 72 साल पुरानी बातों से वर्तमान समय में अपनी कमियों को छुपाना कौनसी कूटनीति है ?जो नेहरू कभी भारत देश के सबसे प्रमुख खेवनहार बने वो आज देशद्रोही घोषित कर दिए जाते हैं और सरकार ऐसे व्यक्तियों को समर्थन देती है।  ये कहाँ का न्याय है। 

2 . इन्हें शर्म क्यों नहीं आती है ?
जिस UPA सरकार ने भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।  लाखों करोड़ रूपये के जिस कार्यकाल में घोटाले हुए।  जिस तंत्र में प्रधानमन्त्री को मूकदर्शक बना दिया गया और पार्टी एवं पार्टी के नेता स्वयं को देश से ऊपर समझने लगे वे लोग आज सरकार सवाल कैसे पूछ पा रहे हैं ? कहीं न कहीं तो इन्हे भी खुद पर हंसी और तरस दोनों आता होगा। 
चलिए ठीक है कि इन्होने गलतियां करी और खामियाजा भुगता। सरकार से सवाल करना और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर वाद विवाद करना लोकतंत्र का हिस्सा है और महत्वपूर्ण भी है। लेकिन क्या आज विपक्ष की भाषा को हम मर्यादित कह सकते हैं ? दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री इस देश की सवा सौ करोड़ जनसंख्या का मुखिया है।  इस मुखिया पर आरोप भी लगें तो कम से कम भाषा तो संयमित और मर्यादित होनी चाहिए। बिना कोई आरोप साबित किये तो अदालत भी किसी को दोषी करार नहीं देती है और ये लोग अपने स्वार्थ के लिए , केवल आरोप के आधार पर कह देते हैं " प्रधानमंत्री चोर है " ये किस गर्त में गिरी हुई राजनीतिक मर्यादा है ?
ये सोचने की बात है। 

3 . क्या वाकई में कसमें , वादे , प्यार , वफ़ा सब बाते हैं ?
सन 2014 का समय और भ्रष्टाचार से त्रस्त और आगबबूला देश , इसी गुस्से को हथियार बनाते हुए एक व्यक्ति करता है वादा  - कालाधन वापस लाने का वादा , भ्रष्टाचार को मिटाने का वादा , भ्रष्टाचारियों को सजा दिलवाने का वादा , महंगाई को कम करने का वादा , देश के किसान को खुशहाल करने का वादा , बेरोजगारी को दूर करने का वादा, भारत को जापान सरीखा देश बनाने का वादा। 
इन्हीं वादों के दम पर यह व्यक्ति तत्कालीन सरकार को हटाने में कामयाब होते हैं और देश को " नरेंद्र दामोदरदास मोदी " नामक  एक सशक्त नेता प्रधानमन्त्री के रूप में मिलता है।  पूर्ण बहुमत वाली सरकार से पुरे देश को उम्मीदें होती है लेकिन नतीजा क्या ? वही ' ढाक के तीन पात। ' 
जिस 2 जी घोटाले को अपना मुख्य हथियार बनाकर यह सरकार सत्ता में आती है वह घोटाला साबित ही नहीं हो पता और सबूतों के अभाव में अभियुक्त छोड़ दिए जाते हैं।  जिन संस्थानों की स्वतंत्रता पर ये लोग सवाल उठाते थे ( CAG , CBI आदि ) वो संस्थाए आज इसी सरकार की कठपुतली नजर आती है। हजारों करोड़ रुपये लेकर भ्रष्टाचारी विदेश भाग जाते हैं तो इसका ठीकरा पिछली सरकार पर फोड़ दिया जाता है।  किसान कर्ज से परेशान होकर देश की राजधानी में प्रदर्शन करते हैं तो उन पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है और किसान आत्महत्या पर मजबूर हो जाता है। महंगाई आज भी बेलगाम दिखती है। देश के युवा को रोजगार के नाम पर ठगा जाता है , परीक्षाओं को व्यस्थित ढंग से संपन्न करवाने के लिए विद्यार्थियों को धरना देना पड़ता है। पढ़े लिखे युवा को नौकरी के नाम पर अज़ीबोगरीब व्यवसाय ( पकोड़ा बेचने जैसे )बताये जाते हैं  और इन बयानों की पैरवी भी की जाती है। कालाधन वापसी का ब्यान तो बेहिचक सबके सामने ' चुनावी जुमला ' कह दिया जाता है। 
इन हालात में तो कसमें , वादे , प्यार , वफ़ा  सब बातें ही नज़र आते हैं। 
  
4 . सवाल यही है कि सवाल क्यों नहीं ?
 वर्तमान सरकार में यही यक्षप्रश्न उभरकर आया है की सवाल पूछने का अधिकार बहुत सीमित या लगभग समाप्त कर दिया गया है। इतने सपने संजोकर जो सरकार हमने चुनी थी वो सरकार यदि अपने कार्य में असफल हुई तो सवाल पूछने का अधिकार पुरे देश को होना चाहिए , लेकिन यदि वर्तमान समय में ऐसा कोई करता है तो उसे गद्दार , देशद्रोही आदि उपमाएं दे दी जाती हैं। 
आज के दौर में मोबाइल खरीदने पर भी गारंटी - वारंटी मिलती है लेकिन सरकार अगर काम ठीक से ना करे तो जनता किस्से से सवाल करे ? क्योंकि सवाल पूछते ही आप मुग़ल मानसिकता वाले , हिंदु विरोधी , राष्ट्रद्रोही जैसी संज्ञाओं से सुशोभित होते हैं।  सरकार बिल्क़ुल मौन की अवस्था में है और ये मौन तभी टूटता है जब कहीं चुनावी रैली होती है। 
ऐसे में सवाल के अधिकार का सवाल तो बनता है। 


5 . एक नयी कूटनीति इस सरकार ने हमें सिखाई की कोई सिर की बात करे तो आप पैर का मुद्दा उठा लो अर्थात बिल्कूल तर्कहीन बात करना।  अक्सर देखने को मिला की बेरोजगारी , किसानों की बदहाली जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे गाय , हिंदुत्व, टीपू सुलतान , इस्लामिक सोच जैसी फिजूल की बातों के पीछे धकेल दिए गए। हर बात पर देशभक्ति को ढाल बना लेना और देशभक्ति के नाम पर अन्य समस्याओं को महत्वहीन कर देना इस सरकार का मास्टरस्ट्रोक हो गया है। 
जब युवा रोजगार की चर्चा करना चाहे तो हिंदुत्व खतरे में आ जाए , नौकरी की बात करे तो छप्पन इंची साइन वाले प्रधानमंत्री को सर्जिकल स्ट्राइक का नायक बनाकर उसे भुला दिया जाए। 
इस प्रकार के अनेक मुद्दे रहे हैं जब सरकार वास्तविक परिस्थितियों  और हालातों पर बात करने से बचती रही। 

6 . हाल ही में कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी का एक बयान आया - " बीजेपी ने जूत्ते मारकर आडवाणी जी को बाहर का रास्ता दिखा दिया।  "
 देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष का इस तरह का घटिया बयान हम किसी भी मायने में शोभाजनक नहीं कह सकते। लालकृष्ण आडवाणी जी देश के पुराने नेता हैं और वर्तमान समय की बीजेपी की स्थिति के पीछे इनका अहम योगदान रहा है।  पार्टीनीति के कारण और अधिक उम्र के कारण ये अब चुनाव नहीं लड़ेंगे लेकिन इतनी अपमानजनक बात की उम्मीद सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष से कोई नहीं करता। 
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पिछले कुछ समय में राजनीति की भाषा कई बार सार्वजनिक रूप से अपवित्र हुई है। 
स्वयं प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस की पूर्वाध्यक्ष सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के लिए सार्वजनिक रूप से अपमानजनक टिप्पणियां करते देखे गए हैं। वाकया प्रियंका गाँधी के सक्रिय राजनीति में आने का हो या स्मृति ईरानी का , ऐसे अनेक मौके आये जब राजनीति की भाषा तार - तार हुई और मानवीय गरिमा का अपमान हुआ। 
आडवाणी जी को जूत्ते मारने की बात कही जाती है , सोनिया गाँधी जी की देश के प्रति निष्ठा पर सवाल उठाया जाता है , प्रियंका गाँधी और स्मृति ईरानी को लेकर भद्दे कमेंट्स किये जाते हैं।  
सबसे बड़ी बात कि कोई पार्टी केवल और केवल चुनावी फायदे के लिए विपक्ष को आतंकवादियों से मिला हुआ बताती है , पाकिस्तान से संचालित बताती है , गद्दारों का समूह बताती है - ये निकृष्टतम राजनीति है , इससे नीचे  शायद और नहीं गिरा जा सकता और इसके आगे भगवान् ही सहारा बचता है जो शायद इन नीचे गिर चुके बड़े लोगों को सद्बुद्धि दे सके।  अटल जी जैसे अजातशत्रु नेता और नेहरू जी जैसे कर्मठ व्यक्तित्व का देश जहाँ वाणी को सबसे बड़ा हथियार माना गया था अंग्रेजों के खिलाफ , वहाँ आज के नेताओं की ऐसी भाषा कहीं न कहीं देश की आत्मा को कचोटती है। 
इन पंक्तियों से इन बड़े नेताओं को शायद कुछ आत्मग्लानि महसूस हो 

                                   " मैं कई बड़े लोगों की नीचाई से वाकिफ़ हूँ 
                                      बहुत मुश्किल है दुनिया में बड़ा होकर बड़ा होना  "
  
                                                                                                      















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