Akele Insaan Ka Sachcha Mitra (अकेले इंसान का सच्चा मित्र)



टीवी एक्ट्रेस प्रत्यूषा बनर्जी की आत्महत्या की खबर से टीवी जगत और फिल्मी जगत सदमे में है।

आत्महत्या का कारण प्रत्यूषा का अपने बॉयफ्रेंड से कई दिन से चल रही अनबन को बताया जा रहा है। आये दिन के झगड़े से मानसिक तनाव में प्रत्यूषा ने यह कदम उठाया।
ऐसी ही एक घटना कुछ समय पूर्व भी हुई थी जब बॉलीवुड अभिनेत्री जिया खान ने आत्महत्या की थी।
दोनों ही घटनाओं के कारण काफी मिलते जुलते थे।  ऐसे में सवाल यह उठता है कि टेलिवीजन और फिल्मों की इस चकाचौंध भरी दुनिया में इंसान कब स्वार्थ के जाल में फंसता चला जाता है,उसे स्वयं ही पता नहीं चलता । मतलब और पैसे की दुनिया में तब वह अपने लिए सहारे की तलाश करता है,तब कुछ लोग अपने लालच के लिए इस्तेमाल करते है और जब उसे पता चलता है तब वह डिप्रेशन में चला जाता है और गलत कदम उठता है
इसी तरह की कुछ घटनाएं आती है जब आजकल स्टूडेंट्स आत्महत्या कर लेते है।

                                 

ये सब घटनाएं मानसिक तनाव और सामाजिक दबाव में ऐसे कदम उठाते हैं । इन घटनाओं से पता चलता है की भीड़भाड़ भरी इस दुनिआ में इंसान कितना अकेला है और इस अकेलेपन को दूर करने के लिए वह अनेक कार्य करता है। इन सबको छोड़कर इंसान यदि अपनी समस्याए अपने परिजनों को बताए तो शायद इस प्रकार अप्रिय घटनाओं से बच्चा जा सकता है। अक्सर हम सोचते हैं कि भीड़ में केवल हम ही अकेले हैं बाकी सब किसी न किसी साथ हैं , जबकि असलियत में अधिकतर लोग अकेले होते हैं । अब ये हमारी सोच पर निर्भर करता है कि हम अकेलेपन को किस प्रकार महसूस करते हैं । कुछ लोग जहां अकेलेपन से दुखी हो जाते हैं वहीं कुछ लोग अकेलेपन से खुश रहते हैं । दोनों ही स्थितियां संभव हैं। लेकिन हकीकत में इंसान का सच्चा मित्र वह स्वयं है। यदि वह किसी और को सहारा बनाएगा तो कभी न कभी दुखी होगा । इसलिए स्वंयं का सहारा स्वंय बने । जब इंसान की परछाई भी अँधेरे में उसका साथ छोड़ देती है तो औरों की तो बात ही क्या। इसलिए स्वंय को स्वंय से जोड़ें , खुश रहें । इन घटनाओं से पता चलता है की भीड़भाड़ भरी इस दुनिआ में इंसान कितना अकेला है और इस अकेलेपन को दूर करने के लिए वह अनेक कार्य करता है।


                                       


इन सबको छोड़कर इंसान यदि अपनी समस्याए अपने परिजनों को बताए तो शायद इस प्रकार अप्रिय घटनाओं से बच्चा जा सकता है। अक्सर हम सोचते हैं कि भीड़ में केवल हम ही अकेले हैं बाकी सब किसी न किसी साथ हैं। जबकि असलियत में अधिकतर लोग अकेले होते हैं ।  अब ये हमारी सोच पर निर्भर करता है कि हम अकेलेपन को किस प्रकार महसूस करते हैं । कुछ लोग जहां अकेलेपन से दुखी हो जाते हैं वहीं कुछ लोग अकेलेपन से खुश रहते हैं । दोनों ही स्थितियां संभव हैं। लेकिन हकीकत में इंसान का सच्चा मित्र वह स्वयं है। यदि वह किसी और को सहारा बनाएगा तो कभी न कभी दुखी होगा । इसलिए स्वंयं का सहारा स्वंय बने ।
जब इंसान की परछाई भी अँधेरे में उसका साथ छोड़ देती है तो औरों की तो बात ही क्या।

इसलिए स्वंय को स्वंय से जोड़ें , खुश रहें ।

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